Friday, April 8, 2016

शिक्षण — तृतीय भाग

Shikshan - Part 3

शिक्षण

( तृतीय भाग )

शिक्षण के इस भाग में और तीन प्रकार की प्रमाणिकता क्या हैं उसे लिख रहे हैं ।

वेद, स्मृति, और शिष्टपुरुष; अथवा प्रत्यक्ष, अनुमान, और आगम — ये हैं और तीन प्रकार की प्रमाणिकता । इनसे शिक्षण मिलता है ।

“वेदो खिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् ।
आचार्यश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥”
  (मनुस्मृति)

मनुजीने बताया की वेद और स्मृति — अपौरुषेय वेद-ज्ञान और जो अपने हृदयमें उसकी स्मृति रह जाती है सो, (लेकिन, स्मृतिमें कभी-कभी गड़बड़ी हो जाती है, सांकर्य हो जाता है, इसलिए स्मृतिको एक स्वतः प्रमाण नहीं मानते पर स्मृतिको परतः प्रमाण मानते हैं), और श्रुति-स्मृतिके अनुसार जो हमारे सत्पुरुष आचरण करते हैं सो, तथा आत्मसंतुष्टि — ये चार धर्म के मूल हैं ।

अथवा प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम प्रमाण हैं । प्रत्यक्ष माने इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान, अनुमान अर्थात् बुद्धिके द्वारा प्राप्त ज्ञान, और आगम माने इन्द्रियों और बुद्धिके द्वारा अज्ञात है परन्तु अनादि परम्परासे प्राप्त ज्ञान । हम लोग इसको वेद बोलते हैं । अथवा जो लोग आगम शब्द का अर्थ वेद नहीं मानते हैं वे भी अपने-अपने आगम तो मानते ही हैं — जैसे ईसाई के लिए बाइबिल है, मुसलमान के लिए कुरान है, बौधों के लिए बुद्ध-उपदेश, बुद्ध आगम त्रिपिटक आदि हैं, जैनों के लिए जैनागम हैं । तो कुछ तो प्रत्यक्ष से देख करके, कुछ अनुमानसे विचार करके और कुछ धर्मके बारेमें, स्वर्गके बारेमें और अप्रत्यक्ष वस्तुके बारेमें, शास्त्रके द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जाता है । ऐसे शिक्षणसे अपने अन्तःकरणकी शुद्धि होती है ।

एक और बात है । यज्ञ करना, अध्ययन करना, और दान करना — ऐसा जो करते हैं उन्हें “त्रिकर्मकृत्” कहा जाता है । तो, इस ढंग से जो चलता है, आचरण करता है — तीन बार अग्निका चयन करता है, तीन आचार्यों, वेदादिकों अथवा प्रामाण्योंसे सत्य को जानने की चेष्टा करता है और यज्ञ, दान, अध्ययन करता है — वह जन्म-मृत्यु के संतरण का जो मार्ग है, उस मार्ग पर चलता है ।

स्वामी कृष्णानन्द

रचना – ३० जुलाई २०१४ ॥

© २०१४, सर्वाधिकारसुरक्षित ।

No comments:

Post a Comment