शिक्षण
( प्रथम भाग )
“त्रिभिः सन्धिम् एत्य” — तीन से सम्बन्ध प्राप्त करके मनुष्य सीखता है; अर्थात्, सीखनेके लिए तीन स्थान हैं । तो प्रश्न यह उठता है कि ये तीन कौन हैं?
सर्वप्रथम, संसारमें मनुष्य कुछ अपनी माँ से सीखता है । तत्पश्चात, कुछ बाप से और फिर कुछ आचार्य से सीखता है । ऐसा कोई नहीं जो माँ से न सीखा हो । उदाहरण स्वरूप एक तथ्य को लीजिए, यथा, बच्चेको दूध पीना नहीं आता — बच्चे को दूध पीना माँ ही सिखाती है । बच्चा अगर माँ से यह विद्या ने सीखे तो उसका उदर पूर्ति न होगा और वह भूखा ही मर जाएगा । इस कारण मैं अपनी माँ को सिक्षागुरुओं मे सर्वोत्तम मानता हूँ और दण्डवत प्रणाम करता हूँ।
कुत्तेके बच्चों को ही लीजिए और उन्हें गौर से देखिए । बचपन से ही हमने यह अनुभव किया है — गाँव में जब कुतिया ब्याती थी तब वह बच्चोंके मुहँके पास लेट जाती थी । उस समय उसके बच्चे अन्धे होते हैं — आँख तब खुली हुई नहीं होती है । बिना आँख के बच्चे अपना मुहँ लेते हुए माँ के शरीर पर इधर-उधर घुमाते हैं और जहाँ उनको स्तन मिल जाता है वहाँ उसको मुहँ मे लेकर पीना शुरू कर देते हैं । उनके अन्दर तो इतनी प्राकृत प्रेरणा होती है । लेकिन यह जो मनुष्य का बच्चा होता है, यह अपने आप माता का स्तन ढूंढ़ नहीं सकता । माता के तो हाथ हैं, कुतिया के तो हाथ नहीं होता । तो मनुष्य माता बच्चेको पहले गोदमें लेती है और फिर वह स्तन परके कपड़ेको हटाती है और बच्चे के मुहँमें पहले थोड़ा-सा दूध गिरा देती है और जब बच्चेको स्वाद आता है तब वह चपर-चपर करने लगता है और पीने लगता है । माने, माता जो है सो बच्चेको दूध पीना सिखाती है । इसका मतलब यह है कि शिक्षण हमें पहले मातासे ही प्राप्त होता है । बादमे शिक्षण हमें पिता से प्राप्त होता है और तत्पश्चात शिक्षण हमें गुरु से प्राप्त होता है । अर्थात्, आदि में माता, उपनयन पर्यन्त पिता, और उपनयन के बाद समावर्तन पर्यन्त आचार्यसे, और सौभाग्य हो तो गुरुसे, शिक्षण प्राप्त होता है । आचार्य तो शिक्षा देकर स्नातक बनादें, पर गुरु-शिक्षा का अन्त नहीं!
इन तीनोंसे आपने सिक्षा प्राप्त कर ली है कि नहीं? उन तीनोंसे पहले शिक्षा प्राप्त कर लेनी चाहिए, क्योंकि ये तीनों धर्मज्ञान में “प्रामाण्य-कारण” हैं ।
”प्रामाण्य-कारण” हैं का मतलब क्या है वह अगले भाग में लिखेंगे ।
“मात पिता गुरू प्रभु चरणों में ...”
“
मात पिता गुरू प्रभु चरणों में प्रणवत बारम्बार।
हम पर किया बड़ा उपकार।
हम पर किया बड़ा उपकार।।
माता ने जो कष्ट उठाया, वह ऋण कभी न जाए चुकाया।
अंगुली पकड़ कर चलना सिखाया, ममता की दी शीतल छाया।।
जिनकी गोदी में पलकर हम कहलाते होशियार।
हम पर किया बड़ा उपकार।
हम पर किया बड़ा उपकार।
मात पिता गुरू प्रभु चरणों में प्रणवत बारम्बार।।
पिता ने हमको योग्य बनाया, कमा कमा कर अन्न खिलाया।
पढ़ा लिखा गुणवान बनाया, जीवन पथ पर चलना सिखाया।।
जोड़ — जोड़ अपनी सम्पति का बना दिया हकदार।
हम पर किया बड़ा उपकार।
हम पर किया बड़ा उपकार।
मात पिता गुरू प्रभु चरणों में प्रणवत बारम्बार।।
तत्त्वज्ञान गुरू ने दरशाया, अंधकार सब दूर हटाया।
हृदय में भक्तिदीप जला कर, हरि दर्शन का मार्ग बताया।
बिनु स्वारथ ही कृपा करें वे, कितने बड़े हैं उदार।
हम पर किया बड़ा उपकार।
हम पर किया बड़ा उपकार।
मात पिता गुरू प्रभु चरणों में प्रणवत बारम्बार।।
प्रभु किरपा से नर तन पाया, संत मिलन का साज सजाया।
बल, बुद्धि और विद्या देकर सब जीवों में श्रेष्ठ बनाया।
जो भी इनकी शरण में आता, कर देते उद्धार।
हम पर किया बड़ा उपकार।
हम पर किया बड़ा उपकार।
मात पिता गुरू प्रभु चरणों में प्रणवत बारम्बार।।
”
इस गीत को “यू-ट्यूब” में सुनिए ...
स्वामी कृष्णानन्द
रचना – ३० जुलाई २०१४ ॥
© २०१४, सर्वाधिकारसुरक्षित ।
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