Friday, April 8, 2016

शिक्षण — द्वितीय भाग

Shikshan - Part 2

शिक्षण

( द्वितीय भाग )

शिक्षण के इस भाग में “प्रामाण्य-कारण” का मतलब लिख रहे हैं ।

ज़रा गौर कीजिए — माँ ने बताया कि यह तुम्हारी नाक है, ये तुम्हारे दाँत हैं, ये तुम्हारे कान हैं, ये हाथ हैं, ये पाँव हैं । अब आप बताओ, आपको किस प्रमाण से यह बात मालूम हुई कि यह जो हम उठाते हैं इसका नाम हाथ है, या जिससे हम सुनते हैं उसका नाम कान है? यह बात किस प्रमाण से मालूम पड़ी? इसका नाम नाक न हो, कान हो, और उसका नाम कान न हो, नाक हो — यह व्यवस्था आपकी बुद्धिमें पहले-पहल कहांसे आयी? मातासे आयी ना? अपना गोत्र आपको कहांसे मालूम हुआ? अपनी जाती आपको कहांसे मालूम हुई? अपना वंश-परिवार आपको कहांसे मालूम हुआ? पितासे मालूम हुआ न! और यह अक्षर ‘अ’ होता है, यह ‘क’ होता है — यह बिन्दुको फैलाकर कैसे अक्षर बनाये जाते हैं — यह किसने सिखाया? आचार्य ने!

आचार्य सिखाते हैं कि यह सारे अक्षरों का रूप बिन्दुका ही विस्तार है । एक बिन्दी कागज पर लगाकर उसमें किधरको लकीर खींचदें तो क्या हो जायेगा — बस इतनी ही विद्या है । यह कुल, कुल-कि-कुल विद्या इतनी है कि एक विन्दु कागज पर बनाकरके उसके आगे, उसके पीछे, उसके ऊपर, उसके निचे, कैसे-कैसे लकीर खींच दें तो कौन-कौन से अक्षर बन जायँ । यह विन्दु और लकीर — यह लकीर जिसको रेखा कहते हैं यह भी तो आखिर विन्दु ही है — उसको आप कभी खुर्दबीन से देखो तो मालूम पडेगा । यह बात आप खुद ही परीक्षण करके देख सकते हैं — इन छापी हुई अक्षरों में से कोई भी एक रेखा को आप अगर कभी खुर्दबीन यन्त्र से देखो तो आपको अलग-अलग विन्दु दिखायी पड़ेंगे — रेखा नहीं दिखायी पड़ेगी । तो, यह बिन्दु में से रेखा, रेखा में से अक्षर, और फिर ये अक्षर स्वर हैं, ये अक्षर वर्ण हैं, ये मात्रा हैं — इनसे शब्द बनते हैं, फिर शब्दों से वाक्य बनते हैं, और वाक्यों से अर्थ निकलता है । यह सारा संकेत आचार्यसे सीखना पड़ता है । यह निहीं समझना कि यह सब हमने अपने हृदय में से या कॅालेज में से निकाला है; यह नहीं समझना कि यह सब हमने अमेरिका या रूस कि प्रोयोगशाला में जाकर सिखा है! इसके लिए माता कि पाठशाला, पिता कि पाठशाला, आचार्य कि पाठशाला काम देती है ।

श्रुति का कहना है   “मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् ब्रूयात् ।”
 — जो मातावाला, पितावाला, आचार्यवाला होता है वही इसको जानता है, वही इसको कहे ।  — (बृहदारण्यकोपनिषत्, ४.१.२)

तीन प्रकार की प्रमाणिकता और है — वह अगले भाग में लिखेंगे ।

स्वामी कृष्णानन्द

रचना – ३० जुलाई २०१४ ॥

© २०१४, सर्वाधिकारसुरक्षित ।

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