Saturday, April 16, 2016

यज्ञोपवित या जनेऊ — प्रथम भाग

Sacred Thread Part - 1

यज्ञोपवित या जनेऊ

( प्रथम भाग )

“शिक्षण” निबंध में आपने पढ़ा की आदि में माता, ‘उपनयन’ पर्यन्त पिता, और ‘उपनयन’ के बाद समावर्तन पर्यन्त आचार्यसे सिक्षा मिलती है। ‘उपनयन संस्कार’ — जिसे ‘यज्ञोपवीत संस्कार’ भी कहा जाता है — के समय ‘जनेऊ’ को धारण कराया जाता है।

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णों में ‘यज्ञोपवित संस्कार’ यानी जनेऊ पहनाने की परंपरा है। जनेऊ को संस्कृत भाषा में ‘यज्ञोपवीत’ कहते हैं। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। जनेऊ तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। जनेऊ एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। मंत्रोच्चारण से इसमें शक्ति संचार कर दी जाती है और मंत्रपाठ के साथ इसे पहनाया जाता है। दूषित या जीर्ण होजाने पर जनेऊ को नियमानुसार बदल देते हैं और नया सूत्र धारण करते हैं।

साधारणतः जनेऊ को बालक के दस से बारह वर्ष की आयु का होने पर उसकी यज्ञोपवित अर्थात उपनयन संस्कार की जाती है। पूर्व काल में ब्राह्मण कुलके बालकों का उपनयन संस्कार पाँच या सात साल की उम्र में ही करायाजाता था जिससे वह एक अनुकूल परिस्थिति का लाभ ले सकें। वह कैसे? क्योंकि जनेऊ पहनने के पश्चात ही बालक को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार मिलता था। और सिक्षा ब्राह्मण कुल अपने संतानों को सर्व प्रथम ही देना पसंद करते।

तीन स्वतंत्र धागों को विशेष विधि से ग्रन्थित करके जनेऊ निर्माण करते हैं जिससे एक सूत्र में तीन तार या स्थर हों और तीन सूत्रों से नौ धागों का गठन बने। सूत के इन नौ धागों में जीवन विकास का सारा मार्गदर्शन समाविष्ट कर दिया गया है। इन धागों को कन्धों पर, हृदय पर, कलेजे पर, पीठ पर प्रतिष्ठापित करने का प्रयोजन यह है कि सन्निहित शिक्षाओं का यज्ञोपवीत के ये धागे हर समय स्मरण करायें और उन्हीं के आधार पर हम अपनी रीति-नीति का निर्धारण करते रहें।

“सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र” में लिखा है कि यज्ञोपवीत के नौ धागों में नौ देवता निवास करते हैं, यथा — (१) ॐकार, (२) अग्नि, (३) अनन्त, (४) चन्द्र, (५) पितृ, (६) प्रजापति, (७) वायु, (८) सूर्य, (९) सब देवताओं का समूह।

अर्थात् — वेद मंत्रों से अभिमंत्रित एवं संस्कारपूर्वक कराये यज्ञोपवीत में नौ (९) शक्तियों का निवास होता है। जिस शरीर पर ऐसी समस्त देवों की सम्मिलित प्रतिमा की स्थापना है, उस शरीर रूपी देवालय को परम श्रेय साधना ही समझना चाहिए।

“सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र” में यज्ञोपवीत के संबंध में एक महत्वपूर्ण उल्लेख है —
“ब्रह्मणोत्पादितं सूत्रं विष्णुना त्रिगुणी कृतम्।
कृतो ग्रन्थिस्त्रनेत्रेण गायत्र्याचाभि मन्त्रितम्।।”


अर्थात् — ब्रह्माजी ने तीन वेदों से तीन धागे का सूत्र बनाया। विष्णु ने ज्ञान, कर्म, उपासना इन तीनों काण्डों से तिगुना किया और शिवजी ने गायत्री से अभिमंत्रित कर उसे ब्रह्म गाँठ लगा दी। इस प्रकार यज्ञोपवीत नौ तार और ग्रंथियों समेत बनकर तैयार हुआ।

नौ धागों में नौ गुणों के प्रतीक हैं। ये गुण हैं — (१) अहिंसा, (२) सत्य, (३) अस्तेय, (४) तितिक्षा, (५) अपरिग्रह, (६) संयम, (७) आस्तिकता, (८) शान्ति, और (९) पवित्रता।

“अभिनव संस्कार पद्धति” में श्लोकों के साथ और नौ गुण बताये गये हैं, यथा — (१) हृदय से प्रेम, (२) वाणी में माधुर्य, (३) व्यवहार में सरलता, (४) नारी मात्र में मातृत्व की भावना, (५) कर्म में कला और सौन्दर्य की अभिव्यक्ति, (६) सबके प्रति उदारता और सेवा भावना, (७) गुरुजनों का सम्मान एवं अनुशासन, (८) सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय एवं सत्संग, और (९) स्वच्छता, व्यवस्था और निरालस्यता का स्वभाव।

आगामी भाग में जनेऊ धारण क्यों करते हैं वह उल्लेख करेंगे।

स्वामी कृष्णानन्द

रचना – ३० जुलाई २०१४ ॥

© २०१४, सर्वाधिकारसुरक्षित ।

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